श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 9

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: | प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता: || ९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
एताम्
इस
दृष्टिम्
दृष्टि को
अवष्टभ्य
आश्रय लेकर
नष्टात्मान
आत्मा से गिरे हुए
अल्पबुद्धय
अल्पबुद्धि वाले
प्रभवन्ति
प्रकट होते हैं
उग्रकर्माण
क्रूर कर्म करने वाले
क्षयाय
नाश के लिए
जगत
जगत् का
अहिता
अहितकारी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस दृष्टिकोण को धारण करके वे नष्ट हुई आत्मा वाले अल्पबुद्धि लोग उग्र कर्म करने वाले, जगत् के अहितकारी और नाश के लिए उत्पन्न होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जो लोग ऐसी नास्तिक मान्यता रखते हैं, वे आत्मिक रूप से पतित हो जाते हैं। उनकी बुद्धि अल्प होती है और वे संसार के लिए हानिकारक कर्म करते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस आसुरी दृष्टिकोण को आश्रय देकर, आत्मा से पतित, अल्पबुद्धि वाले लोग क्रूर कर्म करने वाले, जगत् का अहित करने वाले और नाश के लिए उत्पन्न होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गलत दर्शन मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। सही ज्ञान और सद्बुद्धि ही कल्याणकारी है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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श्लोक 9/24 38% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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