मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: | मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || १०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदकामम्
कामना को
आश्रित्य
आश्रय लेकर
दुष्पूरम्
जो कभी नहीं भरती
दम्भमानमदान्विता
दम्भ, मान और मद से युक्त
मोहात्
मोह से
गृहीत्वा
ग्रहण करके
असद्ग्राहान्
असत्य को
प्रवर्तन्ते
बर्तते हैं
अशुचिव्रता
अपवित्र व्रत वाले।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
दुष्पूर कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण असत्य को ग्रहण करके वे अपवित्र व्रतों का पालन करने वाले होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आसुरी लोग अतृप्त कामनाओं के वशीभूत होते हैं। वे दम्भी, अभिमानी और मदांध होते हैं। वे मोहवश असत्य सिद्धान्तों को पकड़ लेते हैं और अपवित्र आचरण करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
वे दुष्पूर (कभी न भरने वाली) कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, अभिमान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण असत्य विचारों को ग्रहण करते हैं और अपवित्र आचरण वाले हो जाते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
कामना, दम्भ और मद मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। सत्य और पवित्रता का आचरण ही श्रेयस्कर है।