श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 11

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: | कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: || ११||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
चिन्ताम्
चिन्ता को
अपरिमेयाम्
असीम
च
और
प्रलयान्ताम्
मृत्यु पर्यन्त
उपाश्रिता
आश्रित
कामोपभोगपरमा
भोग ही परम लक्ष्य
एतावत्
इतना ही
इति
ऐसा
निश्चिता
निश्चय करने वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वे मृत्यु पर्यन्त रहने वाली असीम चिन्ता का आश्रय लिए रहते हैं, काम-भोग को ही परम मानते हैं और "बस यही सब कुछ है" – ऐसा निश्चय कर लेते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आसुरी लोग भोग को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं। वे सांसारिक चिन्ताओं में डूबे रहते हैं और मृत्यु तक उनका कोई अन्त नहीं होता।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वे मृत्यु तक रहने वाली असीम चिन्ता का आश्रय लेते हैं, काम-भोग को ही परम मानते हैं और यह निश्चय कर लेते हैं कि बस यही सब कुछ है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भोगवादी दृष्टिकोण चिन्ता और अशान्ति का कारण बनता है। वास्तविक सुख आत्मिक उन्नति में है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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श्लोक 11/24 46% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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