श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 12

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 164 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: | ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् || १२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
आशापाशशतै
आशा रूपी सैंकड़ों फन्दों से
बद्धा
बंधे हुए
कामक्रोधपरायणा
काम और क्रोध में तत्पर
ईहन्ते
इच्छा करते हैं
कामभोगार्थम्
भोगों के लिए
अन्यायेन
अन्यायपूर्वक
अर्थसञ्चयान्
धन के संचय की।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आशा रूपी सैंकड़ों फन्दों से बंधे हुए, काम-क्रोध में लगे हुए, वे भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धन का संचय करना चाहते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आसुरी लोग आशाओं के जाल में फँसे रहते हैं। काम और क्रोध उन्हें प्रेरित करते हैं। वे अन्यायपूर्वक धन इकट्ठा करने में लगे रहते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आशा रूपी सैंकड़ों फन्दों में बंधे हुए, काम और क्रोध में तत्पर, वे भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धन का संचय करने की इच्छा करते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

अन्याय से धन कमाना और आशाओं में बँधे रहना मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। धर्म से अर्जित धन ही सुखदायी होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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