श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 13

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् | इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् || १३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
इदम्
यह
अद्य
आज
मया
मेरे द्वारा
लब्धम्
प्राप्त किया
इमम्
यह
प्राप्स्ये
प्राप्त करूँगा
मनोरथम्
मनोरथ
इदम्
यह
अस्ति
है
इदम्
यह
अपि
भी
मे
मेरा
भविष्यति
होगा
पुन
फिर
धनम्
धन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैंने आज यह प्राप्त कर लिया, अब उस मनोरथ को प्राप्त करूँगा। यह धन मेरे पास है, और यह भी मुझे भविष्य में मिलेगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक आसुरी व्यक्ति की सोच को दर्शाता है। वह सोचता है कि उसने आज यह पाया, कल वह पाएगा। वह अपने वर्तमान और भविष्य के धन पर अहंकार करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आसुरी व्यक्ति सोचता है: "मैंने आज यह प्राप्त कर लिया, अब उस मनोरथ को प्राप्त करूँगा। यह धन मेरे पास है, और यह भी भविष्य में मेरा होगा।"

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह अहंकार और ममता का सूचक है। वास्तविक सुख तो ईश्वर में समर्पण से मिलता है, न कि संग्रह से।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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