श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 14

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि | ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी || १४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
असौ
वह
मया
मेरे द्वारा
हत
मारा गया
शत्रु
शत्रु
हनिष्ये
मारूँगा
च
और
अपरान्
दूसरों को
अपि
भी
ईश्वर
ईश्वर (स्वामी)
अहम्
मैं
अहम्
मैं
भोगी
भोगी
सिद्ध
सिद्ध
अहम्
मैं
बलवान्
बलवान्
सुखी
सुखी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान् हूँ और सुखी हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आसुरी व्यक्ति अपने को सर्वश्रेष्ठ मानता है। वह सोचता है कि वही ईश्वर है, वही भोगी है, वही सिद्ध है। यह अहंकार का चरम है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आसुरी व्यक्ति सोचता है: "वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान् हूँ और सुखी हूँ।"

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह अहंकार का घोर रूप है, जो मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। विनम्रता और ईश्वर-समर्पण ही सच्चा मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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श्लोक 14/24 58% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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