मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया | यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || १५||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदआढ्य
धनी
अभिजनवान्
कुलीन
अस्मि
हूँ
क
कौन
अन्य
अन्य
अस्ति
है
सदृश
समान
मया
मुझसे
यक्ष्ये
यज्ञ करूँगा
दास्यामि
दान दूँगा
मोदिष्ये
आनन्द मनाऊँगा
इति
इस प्रकार
अज्ञानविमोहिता
अज्ञान से मोहित।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं धनी और कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आसुरी लोग धन और कुल के अभिमान में चूर रहते हैं। वे सोचते हैं कि उनके समान कोई नहीं। यज्ञ-दान भी अहंकार के लिए करते हैं। यह सब अज्ञान का परिणाम है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आसुरी व्यक्ति सोचता है: "मैं धनी हूँ, कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा" – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
धन और कुल का अभिमान मनुष्य को विनाश की ओर ले जाता है। विनम्रता और सेवा भाव ही श्रेष्ठ हैं।