श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 15

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 3 मिनट का पठन 104 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया | यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || १५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
आढ्य
धनी
अभिजनवान्
कुलीन
अस्मि
हूँ
क
कौन
अन्य
अन्य
अस्ति
है
सदृश
समान
मया
मुझसे
यक्ष्ये
यज्ञ करूँगा
दास्यामि
दान दूँगा
मोदिष्ये
आनन्द मनाऊँगा
इति
इस प्रकार
अज्ञानविमोहिता
अज्ञान से मोहित।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं धनी और कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आसुरी लोग धन और कुल के अभिमान में चूर रहते हैं। वे सोचते हैं कि उनके समान कोई नहीं। यज्ञ-दान भी अहंकार के लिए करते हैं। यह सब अज्ञान का परिणाम है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आसुरी व्यक्ति सोचता है: "मैं धनी हूँ, कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा" – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

धन और कुल का अभिमान मनुष्य को विनाश की ओर ले जाता है। विनम्रता और सेवा भाव ही श्रेष्ठ हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 15/24 63% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!