श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 16

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: | प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ || १६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
अनेकचित्तविभ्रान्ता
अनेक प्रकार के चित्तों से विभ्रान्त
मोहजालसमावृता
मोह के जाल से घिरे हुए
प्रसक्ता
आसक्त
कामभोगेषु
भोगों में
पतन्ति
गिरते हैं
नरके
नरक में
अशुचौ
अपवित्र।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अनेक प्रकार की चित्तवृत्तियों से भ्रमित, मोह के जाल से घिरे हुए, काम-भोगों में अत्यधिक आसक्त होकर वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आसुरी लोग मानसिक भ्रम में रहते हैं। वे मोहजाल में फँसे होते हैं और भोगों में आसक्ति के कारण अधोगति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वे अनेक प्रकार की चित्तवृत्तियों से भ्रमित, मोह के जाल से घिरे हुए, काम-भोगों में आसक्त होकर अपवित्र नरक में गिरते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भोगासक्ति और मोह मनुष्य का पतन कर देते हैं। विवेक और वैराग्य से ही कल्याण संभव है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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