मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता: | यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् || १७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदआत्मसम्भाविता
आत्म-प्रशंसक
स्तब्धा
अकड़ने वाले
धनमानमदान्विता
धन और मान के मद से युक्त
यजन्ते
यज्ञ करते हैं
नामयज्ञै
केवल नाम के यज्ञों से
ते
वे
दम्भेन
दम्भ से
अविधिपूर्वकम्
विधि रहित।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
आत्म-प्रशंसक, अकड़ने वाले, धन और मान के मद से युक्त, वे केवल नाम के यज्ञों को दम्भ से करते हैं, विधि के अनुसार नहीं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आसुरी लोग यज्ञ-आदि धार्मिक कार्य भी दम्भ और अहंकार से करते हैं, शास्त्रविधि का पालन नहीं करते। उनके कर्म केवल दिखावे के लिए होते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आत्म-प्रशंसक, अकड़ने वाले, धन और मान के मद से युक्त, वे दम्भ से केवल नाम के यज्ञों को विधि रहित करते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
दम्भ से किया गया धर्म भी अधर्म है। सच्चा धर्म विनम्रता और शास्त्रविधि से किया जाना चाहिए।