मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: | मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || १८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदअहङ्कारम्
अहंकार
बलम्
बल
दर्पम्
घमण्ड
कामम्
काम
क्रोधम्
क्रोध
च
और
संश्रिता
आश्रित
माम्
मुझको
आत्मपरदेहेषु
अपने और दूसरों के शरीरों में
प्रद्विषन्त
द्वेष करते हुए
अभ्यसूयका
ईर्ष्यालु।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ परमात्मा को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं तथा ईर्ष्या करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आसुरी लोग अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध से ग्रस्त रहते हैं। वे ईश्वर को नहीं पहचानते, बल्कि उससे द्वेष करते हैं और दूसरों से ईर्ष्या रखते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ (परमात्मा) को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं और ईर्ष्यालु होते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
अहंकार और द्वेष मनुष्य को ईश्वर से दूर कर देते हैं। ईश्वर सबमें है, इस भाव से प्रेम करना चाहिए।