श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 18

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 3 मिनट का पठन 104 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: | मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || १८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
अहङ्कारम्
अहंकार
बलम्
बल
दर्पम्
घमण्ड
कामम्
काम
क्रोधम्
क्रोध
च
और
संश्रिता
आश्रित
माम्
मुझको
आत्मपरदेहेषु
अपने और दूसरों के शरीरों में
प्रद्विषन्त
द्वेष करते हुए
अभ्यसूयका
ईर्ष्यालु।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ परमात्मा को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं तथा ईर्ष्या करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आसुरी लोग अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध से ग्रस्त रहते हैं। वे ईश्वर को नहीं पहचानते, बल्कि उससे द्वेष करते हैं और दूसरों से ईर्ष्या रखते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ (परमात्मा) को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं और ईर्ष्यालु होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

अहंकार और द्वेष मनुष्य को ईश्वर से दूर कर देते हैं। ईश्वर सबमें है, इस भाव से प्रेम करना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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