मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान् | क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु || १९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदतान्
उन
अहम्
मैं
द्विषत
द्वेष करने वालों को
क्रूरान्
क्रूर
संसारेषु
संसारों में
नराधमान्
नराधमों को
क्षिपामि
डालता हूँ
अजस्रम्
बारम्बार
अशुभान्
अशुभ
आसुरीषु
आसुरी
एव
ही
योनिषु
योनियों में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
उन द्वेष करने वाले क्रूर, नराधम, अशुभ लोगों को मैं बारम्बार संसार में आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान कहते हैं कि ऐसे द्वेषी, क्रूर, नराधम लोगों को वह बार-बार आसुरी योनियों में डालता है, जहाँ वे और अधिक पतित होते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
उन द्वेष करने वाले, क्रूर, संसार में नराधम, अशुभ लोगों को मैं बारम्बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
क्रूरता और द्वेष का फल बुरी योनियाँ हैं। मनुष्य को सद्भाव और करुणा का पालन करना चाहिए।