श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 19

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 105 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान् | क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु || १९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
तान्
उन
अहम्
मैं
द्विषत
द्वेष करने वालों को
क्रूरान्
क्रूर
संसारेषु
संसारों में
नराधमान्
नराधमों को
क्षिपामि
डालता हूँ
अजस्रम्
बारम्बार
अशुभान्
अशुभ
आसुरीषु
आसुरी
एव
ही
योनिषु
योनियों में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उन द्वेष करने वाले क्रूर, नराधम, अशुभ लोगों को मैं बारम्बार संसार में आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान कहते हैं कि ऐसे द्वेषी, क्रूर, नराधम लोगों को वह बार-बार आसुरी योनियों में डालता है, जहाँ वे और अधिक पतित होते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

उन द्वेष करने वाले, क्रूर, संसार में नराधम, अशुभ लोगों को मैं बारम्बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

क्रूरता और द्वेष का फल बुरी योनियाँ हैं। मनुष्य को सद्भाव और करुणा का पालन करना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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