श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 20

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि | मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् || २०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
आसुरीम्
आसुरी
योनिम्
योनि को
आपन्ना
प्राप्त हुए
मूढा
मूढ़
जन्मनि जन्मनि
जन्म-जन्म में
माम्
मुझको
अप्राप्य
न पाकर
एव
ही
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
तत
उससे
यान्ति
जाते हैं
अधमाम्
अधम
गतिम्
गति को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! वे मूढ़ जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होकर मुझे नहीं पाते, और तदनन्तर उससे भी अधम गति को चले जाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आसुरी योनियों में जन्म लेने वाले मूढ़ जीव ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते और क्रमशः अधोगति को प्राप्त होते जाते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कौन्तेय! वे मूढ़ जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होकर मुझे नहीं पाते और उससे भी अधम गति को चले जाते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आसुरी प्रवृत्तियाँ मनुष्य को ईश्वर से दूर करती हैं और अधोगति का कारण बनती हैं। सात्त्विक गुणों से ही उन्नति संभव है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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