श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 21

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: | काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् || २१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
त्रिविधम्
तीन प्रकार का
नरकस्य
नरक का
इदम्
यह
द्वारम्
द्वार
नाशनम्
नाश करने वाला
आत्मन
आत्मा का
काम
काम
क्रोध
क्रोध
तथा
तथा
लोभ
लोभ
तस्मात्
इसलिए
एतत्
इस
त्रयम्
तीनों को
त्यजेत्
त्याग देना चाहिए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यह तीन प्रकार का नरक का द्वार आत्मा का नाश करने वाला है – काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान तीन घोर दुर्गुण बताते हैं – काम, क्रोध, लोभ। ये नरक के द्वार हैं और आत्मा का पतन करते हैं। इन्हें त्यागना आवश्यक है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यह तीन प्रकार का नरक का द्वार (काम, क्रोध, लोभ) आत्मा का नाश करने वाला है। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

काम, क्रोध और लोभ मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। इनसे मुक्त होना ही कल्याण का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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