मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: | आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम् || २२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदएतै
इनसे
विमुक्त
मुक्त
कौन्तेय
हे कौन्तेय
तमोद्वारै
अन्धकार के द्वारों से
त्रिभि
तीन
नर
मनुष्य
आचरति
आचरण करता है
आत्मन
अपने लिए
श्रेय
कल्याण
तत
तदनन्तर
याति
जाता है
पराम्
परम
गतिम्
गति को।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कौन्तेय! जो मनुष्य इन तीन अन्धकार के द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है और तत्पश्चात परम गति को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जो काम, क्रोध, लोभ से मुक्त हो जाता है, वह अपना कल्याण कर पाता है और अंत में परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे कौन्तेय! जो मनुष्य इन तीन (काम, क्रोध, लोभ) रूपी अन्धकार के द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है और तदनन्तर परम गति को प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
काम-क्रोध-लोभ पर विजय पाने वाला ही सच्चा कल्याण प्राप्त कर सकता है।