श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 23

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: | न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || २३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
य
जो
शास्त्रविधिम्
शास्त्र की विधि को
उत्सृज्य
त्यागकर
वर्तते
बर्तता है
कामकारत
मनमाना आचरण करते हुए
न
नहीं
स
वह
सिद्धिम्
सिद्धि को
अवाप्नोति
प्राप्त होता
न
नहीं
सुखम्
सुख
न
नहीं
पराम्
परम
गतिम्
गति को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

शास्त्र विधि का पालन किए बिना स्वेच्छाचारी बनने वाला व्यक्ति न तो सफल होता है, न सुखी, न मोक्ष पाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो शास्त्र की विधि को त्यागकर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख, न परम गति।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शास्त्र हमारे जीवन के मार्गदर्शक हैं। उनकी अवहेलना करने पर जीवन निष्फल हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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