श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 24

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 3 मिनट का पठन 114 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ | ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || २४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
तस्मात्
इसलिए
शास्त्रम्
शास्त्र
प्रमाणम्
प्रमाण
ते
तेरे लिए
कार्याकार्यव्यवस्थितौ
कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में
ज्ञात्वा
जानकर
शास्त्रविधानोक्तम्
शास्त्रविधि से कहे हुए
कर्म
कर्म
कर्तुम्
करने के लिए
इह
इस लोक में
अर्हसि
तू योग्य है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही तेरा प्रमाण है। शास्त्रविधि द्वारा कहे हुए कर्म को जानकर ही तू यहाँ (इस लोक में) करने योग्य है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह अध्याय का समापन श्लोक है। भगवान अर्जुन को शास्त्र को प्रमाण मानने का निर्देश देते हैं। शास्त्र ही बताते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। इसलिए शास्त्रानुसार कर्म करना ही उचित है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही तेरा प्रमाण है। शास्त्रविधि द्वारा बताए गए कर्म को जानकर ही तू यहाँ कर्म करने योग्य है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शास्त्र ही धर्म का मूल है। उनके अनुसार चलने वाला ही जीवन में सफल होता है और मोक्ष का अधिकारी बनता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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