श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 7

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: | न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || ७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
प्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति (कर्म करने की)
च
और
निवृत्तिम्
निवृत्ति (त्याग की)
च
और
जना
लोग
न
नहीं
विदु
जानते
आसुरा
आसुरी
न
नहीं
शौचम्
पवित्रता
न
नहीं
अपि
भी
च
और
आचार
आचार
न
नहीं
सत्यम्
सत्य
तेषु
उनमें
विद्यते
होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्तव्य) को जानते हैं और न निवृत्ति (त्याग) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आसुरी लोग धर्म-अधर्म का विवेक नहीं रखते। वे शास्त्रविधि को नहीं मानते, इसलिए उनमें शौच, आचार और सत्य का अभाव होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्म करने की विधि) को जानते हैं और न निवृत्ति (कर्म त्यागने की विधि) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जिनमें विवेक नहीं, वे आसुरी होते हैं। सच्चा मनुष्य वह है जो शास्त्रों के अनुसार आचरण करता है और सत्य में स्थित रहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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श्लोक 7/24 29% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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