मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: | न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || ७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
18 पदप्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति (कर्म करने की)
च
और
निवृत्तिम्
निवृत्ति (त्याग की)
च
और
जना
लोग
न
नहीं
विदु
जानते
आसुरा
आसुरी
न
नहीं
शौचम्
पवित्रता
न
नहीं
अपि
भी
च
और
आचार
आचार
न
नहीं
सत्यम्
सत्य
तेषु
उनमें
विद्यते
होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्तव्य) को जानते हैं और न निवृत्ति (त्याग) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आसुरी लोग धर्म-अधर्म का विवेक नहीं रखते। वे शास्त्रविधि को नहीं मानते, इसलिए उनमें शौच, आचार और सत्य का अभाव होता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्म करने की विधि) को जानते हैं और न निवृत्ति (कर्म त्यागने की विधि) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
जिनमें विवेक नहीं, वे आसुरी होते हैं। सच्चा मनुष्य वह है जो शास्त्रों के अनुसार आचरण करता है और सत्य में स्थित रहता है।