मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च | दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु || ६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदद्वौ
दो
भूतसर्गौ
प्राणियों की सृष्टियाँ
लोके
लोक में
अस्मिन्
इस
दैव
दैवी
आसुर
आसुरी
एव
ही
च
और
दैव
दैवी
विस्तरश
विस्तार से
प्रोक्त
कही गई
आसुरम्
आसुरी
पार्थ
हे पार्थ
मे
मुझसे
शृणु
सुनो।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस लोक में प्राणियों की दो सृष्टियाँ हैं – दैवी और आसुरी। दैवी का तो विस्तार से वर्णन किया गया; हे पार्थ! अब आसुरी सम्पदा को मुझसे सुनो।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान अब आसुरी प्रकृति का विस्तार से वर्णन करेंगे। पहले दैवी गुण बताए, अब आसुरी गुणों का वर्णन आवश्यक है ताकि उनसे बचा जा सके।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! इस लोक में प्राणियों की दो सृष्टियाँ हैं – दैवी और आसुरी। दैवी का विस्तार से वर्णन किया जा चुका है; अब आसुरी का मुझसे सुनो।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
दैवी और आसुरी प्रकृति को समझना आवश्यक है ताकि हम आसुरी प्रवृत्तियों से बच सकें और दैवी गुणों को विकसित कर सकें।