श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 5

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 111 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता | मा शुच: सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव || ५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
दैवी
दैवी
सम्पत्
सम्पदा
विमोक्षाय
मोक्ष के लिए
निबन्धाय
बन्धन के लिए
आसुरी
आसुरी
मता
मानी गई है
मा
मत
शुच
शोक करो
सम्पदम्
सम्पदा
दैवीम्
दैवी
अभिजात
उत्पन्न हुए
असि
हो
पाण्डव
हे पाण्डव।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गई है। हे पाण्डव! तुम शोक मत करो, तुम दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए हो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक अर्जुन को आश्वस्त करता है कि वे दैवी प्रकृति के हैं, इसलिए मोक्ष के अधिकारी हैं। आसुरी प्रकृति बंधन का कारण बनती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

दैवी सम्पदा (गुण) मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गई है। हे पाण्डव (अर्जुन)! तुम शोक मत करो, तुम दैवी सम्पदा लेकर उत्पन्न हुए हो।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जो दैवी गुणों से युक्त है, उसका जन्म सार्थक है और वह मोक्ष का अधिकारी है। आसुरी गुणों से बचना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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