श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 4

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च | अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् || ४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
दम्भ
दम्भ
दर्प
घमण्ड
अभिमान
अभिमान
च
और
क्रोध
क्रोध
पारुष्यम्
कठोरता
एव
ही
च
और
अज्ञानम्
अज्ञान
च
तथा
अभिजातस्य
उत्पन्न हुए
पार्थ
हे पार्थ
सम्पदम्
सम्पदा
आसुरीम्
आसुरी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान — ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अब भगवान आसुरी प्रकृति के लक्षण बताते हैं। दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, पारुष्य और अज्ञान – ये छः आसुरी गुण हैं। ये मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे पार्थ! जो आसुरी सम्पदा लेकर पैदा होते हैं, उनमें ये गुण होते हैं: दम्भ (पाखण्ड), दर्प (घमण्ड), अभिमान (अहंकार), क्रोध, पारुष्य (कठोरता) और अज्ञान।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ये आसुरी गुण मनुष्य को नीचे गिराते हैं। इनसे बचना चाहिए और सात्त्विक गुणों को धारण करना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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