मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || ३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदतेज
तेज
क्षमा
क्षमा
धृति
धैर्य
शौचम्
पवित्रता
अद्रोह
द्रोह न करना
नातिमानिता
अति मान का न होना
भवन्ति
हैं
सम्पदम्
सम्पदा
दैवीम्
दैवी
अभिजातस्य
जो पैदा हुआ है
भारत
हे भारत (अर्जुन)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भारत! तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह न करना और अभिमान का न होना — ये सब दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इस श्लोक में दैवी सम्पदा के अंतिम गुण बताए गए हैं। तेज, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोह और नातिमानिता – ये सब मिलकर दैवी प्रकृति के व्यक्ति को परिभाषित करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे भारत (अर्जुन)! तेज (उत्साह), क्षमा, धैर्य, शुद्धि (बाह्य-आन्तरिक पवित्रता), किसी से द्वेष न करना और अहंकार का न होना – ये सब दैवी सम्पदा को लेकर जन्मे पुरुष के लक्षण हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ये गुण समग्र रूप से दैवी प्रकृति के सूचक हैं। इनके अभ्यास से मनुष्य दिव्यता को प्राप्त करता है।