श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 3

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 3 मिनट का पठन 105 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || ३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
तेज
तेज
क्षमा
क्षमा
धृति
धैर्य
शौचम्
पवित्रता
अद्रोह
द्रोह न करना
नातिमानिता
अति मान का न होना
भवन्ति
हैं
सम्पदम्
सम्पदा
दैवीम्
दैवी
अभिजातस्य
जो पैदा हुआ है
भारत
हे भारत (अर्जुन)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह न करना और अभिमान का न होना — ये सब दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इस श्लोक में दैवी सम्पदा के अंतिम गुण बताए गए हैं। तेज, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोह और नातिमानिता – ये सब मिलकर दैवी प्रकृति के व्यक्ति को परिभाषित करते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे भारत (अर्जुन)! तेज (उत्साह), क्षमा, धैर्य, शुद्धि (बाह्य-आन्तरिक पवित्रता), किसी से द्वेष न करना और अहंकार का न होना – ये सब दैवी सम्पदा को लेकर जन्मे पुरुष के लक्षण हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ये गुण समग्र रूप से दैवी प्रकृति के सूचक हैं। इनके अभ्यास से मनुष्य दिव्यता को प्राप्त करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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