श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 2

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 2 मिनट का पठन 115 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || २||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
अहिंसा
अहिंसा
सत्यम्
सत्य
अक्रोध
क्रोध का अभाव
त्याग
त्याग
शान्ति
शान्ति
अपैशुनम्
किसी की निन्दा न करना
दया
दया
भूतेषु
सभी प्राणियों में
अलोलुप्त्वम्
लोलुपता का अभाव
मार्दवम्
कोमलता
ह्री
लज्जा
अचापलम्
चपलता का अभाव।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लोलुपता न होना, कोमलता, लज्जा और चपलता का अभाव — ये भी दैवी गुण हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक दैवी सम्पदा के और गुणों का वर्णन करता है। अहिंसा से अचापल तक के ये गुण सात्त्विक जीवन के लक्षण हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सब भूतों पर दया, इन्द्रियों का लोलुप न होना, कोमलता, लज्जा और चपलता का अभाव – ये दैवी गुण हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ये गुण साधक को सात्त्विक बनाते हैं और उसे समाज में श्रेष्ठ बनाते हैं। इनका पालन आवश्यक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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