मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || २||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदअहिंसा
अहिंसा
सत्यम्
सत्य
अक्रोध
क्रोध का अभाव
त्याग
त्याग
शान्ति
शान्ति
अपैशुनम्
किसी की निन्दा न करना
दया
दया
भूतेषु
सभी प्राणियों में
अलोलुप्त्वम्
लोलुपता का अभाव
मार्दवम्
कोमलता
ह्री
लज्जा
अचापलम्
चपलता का अभाव।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लोलुपता न होना, कोमलता, लज्जा और चपलता का अभाव — ये भी दैवी गुण हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक दैवी सम्पदा के और गुणों का वर्णन करता है। अहिंसा से अचापल तक के ये गुण सात्त्विक जीवन के लक्षण हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सब भूतों पर दया, इन्द्रियों का लोलुप न होना, कोमलता, लज्जा और चपलता का अभाव – ये दैवी गुण हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ये गुण साधक को सात्त्विक बनाते हैं और उसे समाज में श्रेष्ठ बनाते हैं। इनका पालन आवश्यक है।