श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 1

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 3 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् || १||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
श्रीभगवान्
भगवान ने
उवाच
कहा
अभयम्
निर्भयता
सत्त्वसंशुद्धि
अन्त:करण की शुद्धि
ज्ञानयोगव्यवस्थिति
ज्ञानयोग में स्थिति
दानम्
दान
दम
इन्द्रियों का दमन
च
और
यज्ञ
यज्ञ
च
तथा
स्वाध्याय
वेदाभ्यास
तप
तप
आर्जवम्
सरलता।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: निर्भयता, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये सब दैवी सम्पदा के लक्षण हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान अर्जुन को दैवी और आसुरी प्रकृतियों के लक्षण समझाने लगते हैं। पहले श्लोक में नौ दैवी गुण बताए गए हैं – अभय से आर्जव तक। ये गुण आत्मोन्नति के मार्ग पर चलने वाले साधक में होने चाहिए।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: अभय (निर्भयता), सत्त्वसंशुद्धि (अन्त:करण की पवित्रता), ज्ञानयोग में स्थिति (आत्मज्ञान में निष्ठा), दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), तप और आर्जव (सरलता) – ये दैवी गुण हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ये गुण मनुष्य को दिव्य बनाते हैं और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। साधक को इनका आचरण करना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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