मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् || १||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्रीभगवान्
भगवान ने
उवाच
कहा
अभयम्
निर्भयता
सत्त्वसंशुद्धि
अन्त:करण की शुद्धि
ज्ञानयोगव्यवस्थिति
ज्ञानयोग में स्थिति
दानम्
दान
दम
इन्द्रियों का दमन
च
और
यज्ञ
यज्ञ
च
तथा
स्वाध्याय
वेदाभ्यास
तप
तप
आर्जवम्
सरलता।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: निर्भयता, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये सब दैवी सम्पदा के लक्षण हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान अर्जुन को दैवी और आसुरी प्रकृतियों के लक्षण समझाने लगते हैं। पहले श्लोक में नौ दैवी गुण बताए गए हैं – अभय से आर्जव तक। ये गुण आत्मोन्नति के मार्ग पर चलने वाले साधक में होने चाहिए।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: अभय (निर्भयता), सत्त्वसंशुद्धि (अन्त:करण की पवित्रता), ज्ञानयोग में स्थिति (आत्मज्ञान में निष्ठा), दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), तप और आर्जव (सरलता) – ये दैवी गुण हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ये गुण मनुष्य को दिव्य बनाते हैं और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। साधक को इनका आचरण करना चाहिए।