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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)

सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) प्रवृत्तियों का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि दैवी संपत्ति मुक्ति देने वाली है और आसुरी संपत्ति बंधन का कारण।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. अध्याय सिंहावलोकन (Overview)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय का नाम "दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)" है। यह अध्याय भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच के परम संवाद को आगे बढ़ाता है और सृष्टि, जीवात्मा तथा परमात्मा के गूढ़ दार्शनिक पहलुओं का सरल विवेचन प्रस्तुत करता है।

अध्याय सारांश

सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) प्रवृत्तियों का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि दैवी संपत्ति मुक्ति देने वाली है और आसुरी संपत्ति बंधन का कारण।

२. विस्तृत व्याख्या (Explanation)

🌿 दैवासुर संपद्विभाग योग 🌿
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga – भगवद्गीता अध्याय १६ (Bhagavad Gita Chapter 16)

॥ श्री हरि: ॐ ॥ यह पृष्ठ श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय 'दैवासुर संपद्विभाग योग' (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) की गहन और विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसमें हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण (Hinglish) है ताकि यह अधिक से अधिक साधकों तक पहुँच सके। इस अध्याय में कुल 24 श्लोक हैं, जो मानव स्वभाव के दो मूलभूत वर्गीकरणों – दैवी (divine) और आसुरी (demonic) प्रवृत्तियों – का विस्तृत विवेचन करते हैं। भगवान कृष्ण बताते हैं कि दैवी संपत्ति (divine qualities) मुक्ति देने वाली है और आसुरी संपत्ति (demonic qualities) बंधन का कारण। यह अध्याय एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान (spiritual psychology) है जो हमें अपने स्वभाव को पहचानने और उसे दैवी दिशा में ढालने की प्रेरणा देता है।


✨ १. दैवी संपद् के २६ गुण – The 26 Divine Qualities

अध्याय के आरंभ में (श्लोक 16.1-3) भगवान उन दैवी गुणों (Daivi Sampad) की सूची देते हैं, जिन्हें धारण करने वाला व्यक्ति मुक्ति का अधिकारी होता है:

📌 दैवी संपद् के २६ गुण – 26 Divine Qualities

  • अभयम् – Fearlessness (निर्भयता)
  • सत्त्वसंशुद्धि: – Purity of mind (अन्तःकरण की शुद्धि)
  • ज्ञानयोगव्यवस्थिति: – Steadfastness in knowledge and yoga
  • दानम् – Charity (दान)
  • दम: – Self-control (इन्द्रियों पर नियंत्रण)
  • यज्ञ: – Sacrifice (यज्ञ करना)
  • स्वाध्याय: – Study of scriptures (शास्त्रों का अध्ययन)
  • तप: – Austerity (तपस्या)
  • आर्जवम् – Straightforwardness (सरलता)
  • अहिंसा – Non-violence (अहिंसा)
  • सत्यम् – Truthfulness (सत्य)
  • अक्रोध: – Freedom from anger (क्रोध का अभाव)
  • त्याग: – Renunciation (त्याग)
  • शान्ति: – Peacefulness (शांति)
  • अपैशुनम् – Not backbiting (चुगली न करना)
  • दया – Compassion (दया)
  • अलोलुप्त्वम् – Non-covetousness (लालच का अभाव)
  • मार्दवम् – Gentleness (कोमलता)
  • ह्री: – Modesty (लज्जा/शर्म)
  • अचापलम् – Absence of fickleness (चंचलता का अभाव)
  • तेज: – Vigor (तेजस्विता)
  • क्षमा – Forgiveness (क्षमा)
  • धृति: – Fortitude (धैर्य)
  • शौचम् – Cleanliness (पवित्रता)
  • अद्रोह: – Absence of malice (द्रोह का अभाव)
  • नातिमानिता – Not being conceited (अहंकार का अभाव)

भगवान कहते हैं (16.3) – हे भारत, ये गुण दैवी संपदा को धारण करने वाले के हैं।

👿 २. आसुरी संपद् के लक्षण – Characteristics of Demonic Nature

श्लोक 16.4 में आसुरी संपद् (Asuri Sampad) के लक्षण बताए गए हैं: 'दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।' – 'दम्भ (पाखण्ड), घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान – ये आसुरी संपदा को धारण करने वाले के लक्षण हैं।'

आसुरी प्रवृत्तियों का विस्तार – श्लोक 16.7-20 में आसुरी लोगों के स्वभाव का विस्तार से वर्णन है। वे न प्रवृत्ति जानते हैं, न निवृत्ति; न शौच, न सत्य, न धर्म। वे मानते हैं कि संसार असत्य है, बिना ईश्वर के, बिना किसी नियम के। काम और क्रोध से ग्रस्त, वे घृणित कर्म करते हैं। वे अहंकार, बल, घमण्ड और काम में मग्न रहते हैं। मैं (भगवान) उन्हें बार-बार नरक योनियों में डालता हूँ।

🚪 ३. नरक के तीन द्वार – The Three Gates to Hell

श्लोक 16.21 में अत्यन्त प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण वचन है: श्लोक 16.21: 'त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।' – 'आत्मा के विनाश के लिए नरक के ये तीन द्वार हैं – काम (lust), क्रोध (anger) और लोभ (greed)। इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए।'

यह त्रयी मानव पतन के तीन मूल कारण हैं। काम से क्रोध पैदा होता है, क्रोध से मोह, और मोह से बुद्धि का नाश। इसलिए गीता बार-बार इन तीनों पर नियंत्रण का उपदेश देती है।

⚖️ ४. दैवी और आसुरी का परिणाम – Results of Divine and Demonic Natures

श्लोक 16.5 में स्पष्ट किया गया है: 'दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।' – 'दैवी संपदा मोक्ष के लिए और आसुरी संपदा बंधन के लिए होती है।' पर भगवान अर्जुन को सांत्वना देते हैं – हे पाण्डव, तू शोक मत कर, तू दैवी संपदा को लेकर पैदा हुआ है।

श्लोक 16.6 में दो प्रकार के प्राणियों की सृष्टि की बात कही गई है – दैवी और आसुरी। आगे के श्लोकों में आसुरी लोगों के कर्मों और उनके पतन का वर्णन है। वे मानते हैं कि जगत झूठा है, बिना आधार के, बिना ईश्वर के। वे केवल काम-भोग को ही सर्वस्व मानते हैं। चिन्ताओं से ग्रस्त, मृत्यु के जाल में फँसे, वे केवल कामना में लीन रहते हैं।

📜 ५. शास्त्र का महत्व – The Importance of Scripture

अध्याय के अंतिम श्लोक (16.23-24) में भगवान शास्त्र के पालन का महत्व बताते हैं। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण उपदेश है:

श्लोक 16.23: 'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।' – 'जो शास्त्रों के विधान को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख, न परम गति।'

श्लोक 16.24: 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।' – 'इसलिए, क्या करना चाहिए और क्या नहीं – यह निश्चित करने के लिए शास्त्र ही तुम्हारा प्रमाण है। शास्त्रों में बताए गए विधान को जानकर ही तुम्हें यहाँ कर्म करना चाहिए।'

शास्त्र का अर्थ – यहाँ शास्त्र का अर्थ केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं, बल्कि वह मार्गदर्शन है जो हमें सत्य, धर्म और विवेक के अनुसार जीना सिखाता है। यह हमारा आंतरिक विवेक भी हो सकता है, जो शास्त्रों के अनुरूप हो।

📖 ६. अध्याय १६ का संक्षिप्त सारांश – Chapter 16 Summary

  • दैवी संपद् (16.1-3) – 26 दिव्य गुणों की सूची, जो मुक्ति देने वाले हैं।
  • आसुरी संपद् (16.4-20) – आसुरी लक्षण – दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता, अज्ञान; आसुरी लोगों के विचार और कर्म; उनका पतन।
  • नरक के तीन द्वार (16.21) – काम, क्रोध, लोभ – इन तीनों का त्याज्य।
  • दैवी-आसुरी का फल और शास्त्र का महत्व (16.5-6, 22-24) – दैवी संपदा मोक्षदायिनी, आसुरी बंधनकारी; शास्त्र के अनुसार आचरण का आदेश।

💡 ७. मुख्य शिक्षाएँ – Core Teachings for Life

  • आत्म-निरीक्षण आवश्यक है – हमें अपने स्वभाव का विश्लेषण करना चाहिए कि हममें दैवी गुण अधिक हैं या आसुरी।
  • दैवी गुणों का विकास करो – भय, क्रोध, लोभ को कम करके अभय, क्षमा, दान, सत्य, दया आदि गुणों को बढ़ाना चाहिए।
  • काम, क्रोध, लोभ – ये तीन शत्रु हैं – इन्हीं से सारे पाप और पतन होते हैं। इन पर विजय पाना ही मानव जीवन की सफलता है।
  • अहंकार और घमण्ड से बचो – ये आसुरी संपदा के मुख्य लक्षण हैं और पतन के कारण।
  • शास्त्र और विवेक का पालन करो – मनमाना आचरण न करें; शास्त्र (धर्मग्रन्थ, सद्गुरु, विवेक) के अनुसार चलें।
  • आसुरी प्रवृत्तियों को पहचानो – केवल भोग को ही जीवन का लक्ष्य मानना, ईश्वर को नकारना, कठोरता और अहंकार – ये आसुरी लक्षण हैं, जिनसे बचना चाहिए।

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) भगवद्गीता का वह अध्याय है जो हमें मानव स्वभाव के दो ध्रुवों का ज्ञान कराता है। यह केवल एक वर्गीकरण नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है जो हमें बताता है कि हमारे भीतर कौन-से गुण हैं और उनका क्या परिणाम होगा। दैवी गुण हमें ऊपर उठाते हैं, आसुरी गुण नीचे गिराते हैं। इस अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण देन है नरक के तीन द्वार – काम, क्रोध, लोभ। ये तीनों मानवता के शाश्वत शत्रु हैं। इन पर विजय पाना ही धर्म है। अंत में भगवान शास्त्र के पालन का आदेश देते हैं – क्योंकि शास्त्र ही वह दर्पण है जो हमें बताता है कि क्या सही है और क्या गलत। यह अध्याय हमें यह सीख देता है कि सच्चा जीवन वही है जो विवेक, धर्म और दैवी गुणों के अनुरूप हो। मनमानी और अहंकार से भरा जीवन अंततः विनाश का कारण बनता है। इसलिए हमें अपने भीतर दैवी गुणों को पहचानना, उन्हें विकसित करना, और आसुरी प्रवृत्तियों से दूर रहना चाहिए।

॥ ॐ तत्सत् ॥ – श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १६ (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) की यह व्याख्या आपके आध्यात्मिक पथ को प्रकाशित करे।

४. श्रीमद्भगवद्गीता के सभी अध्याय

श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
तथ्य समीक्षक

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

(function() { let voiceCounter = 0; const answers = { "ध्यान": "ध्यान मन को स्थिर करने और भीतर विद्यमान चैतन्य (आत्मा) से जुड़ने का वैज्ञानिक मार्ग है। दैनिक १०-१५ मिनट का ध्यान तनाव को कम करता है, मस्तिष्क की एकाग्रता बढ़ाता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है। साधना खंड में हमारे 'श्लोक उच्चारण' व '४३२Hz ध्यान संगीत' का उपयोग करें।", "पंचांग": "वैदिक पंचांग काल-गणना की अत्यंत सटीक वैज्ञानिक प्रणाली है। यह मुख्य रूप से पांच अंगों: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण पर आधारित होती है। इसके माध्यम से सौर तथा चंद्र गतियों के अनुसार शुभ मुहूर्त और राहु काल की स्थिति की गणना की जाती है।", "चार धाम": "सनातन संस्कृति में चार धाम - उत्तर में श्री बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारकाधीश, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और दक्षिण में रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग हैं। इन चारों धामों की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने देश की भौगोलिक एवं आध्यात्मिक एकता को अक्षउन बना रखने के उद्देश्य से की थी।", "आज का पंचांग": "आज का पंचांग देखने के लिए कृपया हमारे 'आज का वैदिक पंचांग' विजेट को देखें। वर्तमान दिन के अनुसार तिथि तथा राहु काल की सटीक गणना वहां उपलब्ध है।", "गायत्री": "गायत्री महामंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः...) समस्त वेदों का सार माना गया है। यह सविता देव (सूर्य) की उपासना करता है ताकि हमारी बुद्धि सन्मार्ग की ओर प्रेरित हो। इसका नित्य उच्चारण बुद्धि तीव्र करता है।", "केदारनाथ": "केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के पवित्र हिमालय क्षेत्र में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह शिव जी के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसकी स्थापना पांडवों द्वारा की गई मानी जाती है और आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार किया था।" }; function matchResponse(query) { query = query.toLowerCase(); if (query.includes("ध्यान") || query.includes("meditation") || query.includes("sadhana")) { return answers["ध्यान"]; } else if (query.includes("पंचांग") || query.includes("panchang")) { return answers["पंचांग"]; } else if (query.includes("धाम") || query.includes("dham")) { return answers["चार धाम"]; } else if (query.includes("गायत्री") || query.includes("gayatri")) { return answers["गायत्री"]; } else if (query.includes("केदारनाथ") || query.includes("kedarnath")) { return answers["केदारनाथ"]; } else { return "वत्स! आपका प्रश्न अत्यंत कल्याणकारी है। सनातन मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग है। मन को शांत कर सत्यपथ पर चलें। क्या आप किसी विशिष्ट तीर्थ यात्रा अथवा दैनिक साधना के बारे में जानना चाहते हैं?"; } } window.readGuruVoice = function(text, btnId) { window.speechSynthesis.cancel(); const utterance = new SpeechSynthesisUtterance(text); utterance.lang = 'hi-IN'; utterance.rate = 0.85; const btn = document.getElementById(btnId); if (btn) { btn.innerHTML = ' श्रवण जारी है...'; } utterance.onend = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; utterance.onerror = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; window.speechSynthesis.speak(utterance); }; function initChatbot() { const launcher = document.getElementById('chatLauncher'); const drawer = document.getElementById('chatDrawer'); const closeBtn = document.getElementById('chatClose'); const input = document.getElementById('chatInput'); const sendBtn = document.getElementById('chatSendBtn'); const body = document.getElementById('chatBody'); if (!launcher || !drawer || !closeBtn || !input || !sendBtn || !body) { return; } launcher.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.toggle('open'); }); closeBtn.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.remove('open'); }); input.addEventListener('keydown', e => { if (e.key === 'Enter') { submitGlobalMessage(); } }); sendBtn.addEventListener('click', submitGlobalMessage); window.sendGlobalSuggestion = function(text) { input.value = text; submitGlobalMessage(); }; function submitGlobalMessage() { const query = input.value.trim(); if (query === "") return; // User Message bubble const userMsg = document.createElement('div'); userMsg.className = 'chat-msg user'; userMsg.textContent = query; body.appendChild(userMsg); input.value = ""; body.scrollTop = body.scrollHeight; // Typing Indicator const typingIndicator = document.createElement('div'); typingIndicator.className = 'chat-msg guru typing-indicator-container'; typingIndicator.innerHTML = `
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