आज का पंचांग | सूर्योदय: ०५:४५ AM | सूर्यास्त: ०६:५० PM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)

पाँचवाँ अध्याय कर्मयोग और संन्यास के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है, न कि केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला। यह अध्याय समदर्शिता, ज्ञान-विज्ञान और भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. अध्याय सिंहावलोकन (Overview)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय का नाम "कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)" है। यह अध्याय भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच के परम संवाद को आगे बढ़ाता है और सृष्टि, जीवात्मा तथा परमात्मा के गूढ़ दार्शनिक पहलुओं का सरल विवेचन प्रस्तुत करता है।

अध्याय सारांश

पाँचवाँ अध्याय कर्मयोग और संन्यास के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है, न कि केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला। यह अध्याय समदर्शिता, ज्ञान-विज्ञान और भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है।

२. विस्तृत व्याख्या (Explanation)

☮️ कर्मसंन्यास योग ☮️
Karma Sanyas Yoga – भगवद्गीता अध्याय ५ (Bhagavad Gita Chapter 5)

॥ श्री हरि: ॐ ॥ चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण ने ज्ञान और कर्म के रहस्यों का उद्घाटन किया और अर्जुन को ज्ञान की तलवार से संशय काटने का आदेश दिया। अब पाँचवाँ अध्याय 'कर्मसंन्यास योग' (Karma Sanyas Yoga) कर्मयोग और संन्यास के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है। इसमें 29 श्लोक हैं, जो यह बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह नहीं जो केवल कर्मों का त्याग कर दे, बल्कि वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है। यह अध्याय समदर्शिता (equality of vision), ज्ञान-विज्ञान (knowledge and realization) और अंत में भक्ति के मार्ग का सुंदर वर्णन करता है।


❓ १. अर्जुन का प्रश्न – संन्यास या कर्मयोग? (5.1)

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा — "संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्" (5.1) – हे कृष्ण, आप एक ओर कर्मों का संन्यास (त्याग) और दूसरी ओर कर्मयोग (निष्काम कर्म) की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से एक निश्चित रूप से कल्याणकारी मार्ग कौन-सा है, कृपया बताइए। यह प्रश्न गीता के उन शाश्वत प्रश्नों में से है जो हर साधक के मन में उठता है – क्या संसार से हट जाना (संन्यास) श्रेष्ठ है या संसार में रहकर कर्म करना?

⚖️ २. श्रीकृष्ण का उत्तर – दोनों एक हैं, कर्मयोग सरल (5.2–5.6)

श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया — "संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते" (5.2) – संन्यास और कर्मयोग दोनों ही कल्याण के साधन हैं, किन्तु इन दोनों में कर्मसंन्यास (कर्मों का त्याग) की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है। क्यों? क्योंकि संन्यास का मार्ग कठिन है, जबकि कर्मयोग सरल और व्यावहारिक है।

5.3"ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते" – हे महाबाहो! जो न द्वेष करता है और न आकांक्षा रखता है, वह नित्य संन्यासी समझने योग्य है। ऐसा द्वन्द्वों (सुख-दुःख, लाभ-हानि) से मुक्त व्यक्ति सुखपूर्वक बंधन से मुक्त हो जाता है। यहाँ कृष्ण संन्यास की वास्तविक परिभाषा देते हैं – बाहरी त्याग नहीं, आंतरिक अनासक्ति।

5.4–5.6 – अज्ञानी लोग सांख्य (ज्ञानयोग) और कर्मयोग को भिन्न मानते हैं, किन्तु ज्ञानी उन्हें एक ही समझते हैं। जो एक मार्ग में स्थित होता है, वह दोनों का फल पा लेता है (5.4)। कर्मयोगी पहले शुद्ध होकर फिर संन्यासी बनता है, जबकि केवल संन्यास (कर्म त्याग) लेने वाला दुःख पाता है (5.6)।

🧘 ३. सच्चा योगी – कैसे पहचानें? (5.7–5.12)

श्रीकृष्ण अब सच्चे कर्मयोगी के लक्षण बताते हैं:

  • 5.7"योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः" – जो योग में स्थित है, जिसकी आत्मा शुद्ध है, जिसने मन और इंद्रियों को जीत लिया है, और जो समस्त प्राणियों का आत्मा स्वयं बन जाता है – वह कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।
  • 5.8–5.9 – ऐसा योगी देखते, सुनते, छूते, सूंघते, खाते, चलते, सोते, श्वास लेते, बोलते, छोड़ते, पकड़ते, आँखें खोलते-बंद करते हुए भी यही मानता है कि "मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ, केवल इंद्रियाँ विषयों के साथ संयोग कर रही हैं" (5.8–5.9)।
  • 5.10"ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा" – जो ब्रह्म (ईश्वर) में समस्त कर्मों का आरोपण करके, आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से लिप्त नहीं होता।
  • 5.11–5.12 – योगी केवल शरीर, मन, बुद्धि और इंद्रियों से आसक्ति रहित होकर शुद्धि के लिए कर्म करते हैं। निष्काम कर्मयोगी परम शांति पाता है, जबकि आसक्त कर्मी बंधन में पड़ता है।

📌 कमल-पत्र न्याय – The Lotus Leaf Principle

कमल का पत्ता पानी में रहता है, फिर भी पानी उसे गीला नहीं कर पाता। उसी प्रकार, संसार में रहते हुए, कर्म करते हुए भी, आसक्ति-रहित योगी संसार के दुःखों और पापों से अलिप्त रहता है। यह कर्मयोग का सर्वोच्च आदर्श है।

👁️ ४. समदर्शी योगी – समस्त प्राणियों में एक आत्मा (5.13–5.21)

श्रीकृष्ण अब ज्ञानी और समदर्शी योगी का वर्णन करते हैं। ज्ञानी देह त्यागकर नवद्वार पुरी (शरीर) में रहते हुए भी कुछ करता या कराता नहीं मानता (5.13)। प्रकृति (गुण) ही कर्म कराती है, ईश्वर न किसी का पाप लगाता है, न पुण्य – यह तो अज्ञान से ढका ज्ञान है (5.14–5.15)।

5.16 – जिनका अज्ञान ज्ञान से नष्ट हो गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के समान परमात्मा को प्रकाशित कर देता है।

5.17–5.21 – जो बुद्धि, मन और श्रद्धा से परमात्मा में लीन रहते हैं, वे कभी लौटते नहीं (5.17)। "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः" (5.18) – विद्या-विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल में पण्डितजन समान दर्शन करते हैं। यह समदर्शिता (equality of vision) का उच्चतम सूत्र है। ऐसे योगी न स्वर्ग की कामना करते हैं, न नरक का भय – वे ब्रह्म में स्थित रहते हैं (5.19–5.20)।

🧠 ५. ज्ञान-विज्ञान और ब्रह्म-स्थिति (5.22–5.26)

श्रीकृष्ण अब इंद्रिय-सुखों के दोष बताते हैं – जो सुख इंद्रियों के संयोग से उत्पन्न होते हैं, वे दुःख के कारण हैं, क्योंकि उनका आदि-अंत है (5.22)। जो मरने से पहले ही इसी शरीर में काम-क्रोध के वेग को सहन कर लेता है, वह योगी और सुखी है (5.23)।

📌 ब्रह्मभूत और ब्रह्मनिर्वाण (5.24–5.26)

  • 5.24 – जो अंतर-सुखी, अंतर-रति और अंतर-ज्योति है, वह योगी ब्रह्मभूत होकर ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है।
  • 5.25 – जिनके संशय नष्ट हो गए, जिनके अंतःकरण शुद्ध हैं, जो सर्वभूतहित में रत हैं – ऐसे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण पाते हैं।
  • 5.26 – काम-क्रोध से मुक्त, संयमी, ब्रह्म को जानने वाले योगियों को दोनों ओर (इस लोक और परलोक में) ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त है।

🙏 ६. भक्ति का मार्ग – अध्याय का सार और अंतिम श्लोक (5.27–5.29)

श्रीकृष्ण ध्यान योग का संकेत देते हुए कहते हैं कि बाहरी स्पर्शों को त्यागकर, भौंहों के बीच दृष्टि स्थिर करके, समान प्राण-अपान को नासिका के भीतर संतुलित करके, इंद्रियों, मन और बुद्धि को वश में करके, मुक्ति की कामना से रहित योगी मुक्त हो जाता है (5.27–5.28)।

5.29 – गीता का एक महत्वपूर्ण श्लोक "भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति" – जो मुझे समस्त यज्ञ और तपों का भोक्ता, सम्पूर्ण लोकों का महान ईश्वर और सभी प्राणियों का सुहृद (हितैषी मित्र) जान लेता है, वह शांति को प्राप्त होता है।

यह श्लोक गीता के पाँचवें अध्याय का समापन और सार है। यहाँ कृष्ण ने तीन बातें कहीं:

  • भोक्तारं यज्ञतपसाम् – मैं सभी यज्ञों और तपों का भोग करने वाला हूँ।
  • सर्वलोकमहेश्वरम् – मैं समस्त लोकों का महान ईश्वर हूँ।
  • सुहृदं सर्वभूतानाम् – मैं सभी प्राणियों का सुहृद (मित्र) हूँ।

जो इसे जान लेता है, वह शांति पा लेता है। यह भक्ति का मार्ग है – ईश्वर को सर्वस्व मानकर, उन्हें अपना सबसे बड़ा मित्र समझकर जीना।

📖 ७. अध्याय ५ का संक्षिप्त सारांश – Chapter 5 Summary (SEO Optimized)

  • संन्यास बनाम कर्मयोग – अर्जुन का प्रश्न और कृष्ण का उत्तर: दोनों कल्याणकारी, कर्मयोग श्रेष्ठ (5.1–5.6)।
  • सच्चा योगी – आसक्ति रहित, इंद्रिय-विजयी, कर्ता-भाव से मुक्त (5.7–5.12)।
  • समदर्शी और ब्रह्मस्थित – ब्राह्मण-चाण्डाल में समान दृष्टि, निर्द्वन्द्व, शांत (5.13–5.23)।
  • ब्रह्मनिर्वाण और भक्ति – अंतर-सुखी योगी की स्थिति, अंत में ईश्वर को भोक्ता और सुहृद जानने वाले को शांति (5.24–5.29)।

💡 ८. कर्मसंन्यास योग की मुख्य शिक्षाएँ – Core Teachings for Life

  • सच्चा संन्यास आंतरिक है – गेरुआ वस्त्र पहनने या घर छोड़ने से संन्यासी नहीं बना जाता। मन से आसक्ति त्यागना ही सच्चा संन्यास है।
  • कमल की तरह बनो – संसार में रहो, लेकिन संसार को मन में मत रहने दो। कर्म करो, पर फल की चिंता मत करो।
  • सबमें समान आत्मा देखो – विद्वान, गाय, हाथी, कुत्ता – सबमें एक ही परमात्मा है। यह दृष्टि भेदभाव मिटाती है और शांति देती है।
  • ईश्वर को सुहृद मानो – जो ईश्वर को अपना सबसे घनिष्ठ मित्र मान लेता है, उसकी सभी चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं।
  • अंतर-सुख की खोज – बाहरी सुख क्षणिक हैं। जो अंतर में सुखी है, वही सच्चा योगी है।

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyas Yoga) अध्याय ५ का नाम है, जो हमें कर्म और संन्यास के द्वन्द्व से मुक्त करता है। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कर दिया कि बाहरी त्याग से कुछ नहीं होता, जब तक मन में आसक्ति बनी रहे। सच्चा योगी वह है जो संसार में रहते हुए भी संन्यासी है। इस अध्याय के अंत में उन्होंने भक्ति का मार्ग दिखाया – ईश्वर को समस्त यज्ञों का भोक्ता, समस्त लोकों का ईश्वर और समस्त प्राणियों का सुहृद मानना ही शांति का मूलमंत्र है। अब अर्जुन का मन और स्पष्ट हुआ, किन्तु आगे के अध्यायों में कृष्ण ध्यान योग, विभूति योग और भक्ति के और गहरे रहस्यों को खोलेंगे।

॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥

४. श्रीमद्भगवद्गीता के सभी अध्याय

श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
तथ्य समीक्षक

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

(function() { let voiceCounter = 0; const answers = { "ध्यान": "ध्यान मन को स्थिर करने और भीतर विद्यमान चैतन्य (आत्मा) से जुड़ने का वैज्ञानिक मार्ग है। दैनिक १०-१५ मिनट का ध्यान तनाव को कम करता है, मस्तिष्क की एकाग्रता बढ़ाता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है। साधना खंड में हमारे 'श्लोक उच्चारण' व '४३२Hz ध्यान संगीत' का उपयोग करें।", "पंचांग": "वैदिक पंचांग काल-गणना की अत्यंत सटीक वैज्ञानिक प्रणाली है। यह मुख्य रूप से पांच अंगों: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण पर आधारित होती है। इसके माध्यम से सौर तथा चंद्र गतियों के अनुसार शुभ मुहूर्त और राहु काल की स्थिति की गणना की जाती है।", "चार धाम": "सनातन संस्कृति में चार धाम - उत्तर में श्री बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारकाधीश, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और दक्षिण में रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग हैं। इन चारों धामों की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने देश की भौगोलिक एवं आध्यात्मिक एकता को अक्षउन बना रखने के उद्देश्य से की थी।", "आज का पंचांग": "आज का पंचांग देखने के लिए कृपया हमारे 'आज का वैदिक पंचांग' विजेट को देखें। वर्तमान दिन के अनुसार तिथि तथा राहु काल की सटीक गणना वहां उपलब्ध है।", "गायत्री": "गायत्री महामंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः...) समस्त वेदों का सार माना गया है। यह सविता देव (सूर्य) की उपासना करता है ताकि हमारी बुद्धि सन्मार्ग की ओर प्रेरित हो। इसका नित्य उच्चारण बुद्धि तीव्र करता है।", "केदारनाथ": "केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के पवित्र हिमालय क्षेत्र में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह शिव जी के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसकी स्थापना पांडवों द्वारा की गई मानी जाती है और आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार किया था।" }; function matchResponse(query) { query = query.toLowerCase(); if (query.includes("ध्यान") || query.includes("meditation") || query.includes("sadhana")) { return answers["ध्यान"]; } else if (query.includes("पंचांग") || query.includes("panchang")) { return answers["पंचांग"]; } else if (query.includes("धाम") || query.includes("dham")) { return answers["चार धाम"]; } else if (query.includes("गायत्री") || query.includes("gayatri")) { return answers["गायत्री"]; } else if (query.includes("केदारनाथ") || query.includes("kedarnath")) { return answers["केदारनाथ"]; } else { return "वत्स! आपका प्रश्न अत्यंत कल्याणकारी है। सनातन मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग है। मन को शांत कर सत्यपथ पर चलें। क्या आप किसी विशिष्ट तीर्थ यात्रा अथवा दैनिक साधना के बारे में जानना चाहते हैं?"; } } window.readGuruVoice = function(text, btnId) { window.speechSynthesis.cancel(); const utterance = new SpeechSynthesisUtterance(text); utterance.lang = 'hi-IN'; utterance.rate = 0.85; const btn = document.getElementById(btnId); if (btn) { btn.innerHTML = ' श्रवण जारी है...'; } utterance.onend = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; utterance.onerror = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; window.speechSynthesis.speak(utterance); }; function initChatbot() { const launcher = document.getElementById('chatLauncher'); const drawer = document.getElementById('chatDrawer'); const closeBtn = document.getElementById('chatClose'); const input = document.getElementById('chatInput'); const sendBtn = document.getElementById('chatSendBtn'); const body = document.getElementById('chatBody'); if (!launcher || !drawer || !closeBtn || !input || !sendBtn || !body) { return; } launcher.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.toggle('open'); }); closeBtn.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.remove('open'); }); input.addEventListener('keydown', e => { if (e.key === 'Enter') { submitGlobalMessage(); } }); sendBtn.addEventListener('click', submitGlobalMessage); window.sendGlobalSuggestion = function(text) { input.value = text; submitGlobalMessage(); }; function submitGlobalMessage() { const query = input.value.trim(); if (query === "") return; // User Message bubble const userMsg = document.createElement('div'); userMsg.className = 'chat-msg user'; userMsg.textContent = query; body.appendChild(userMsg); input.value = ""; body.scrollTop = body.scrollHeight; // Typing Indicator const typingIndicator = document.createElement('div'); typingIndicator.className = 'chat-msg guru typing-indicator-container'; typingIndicator.innerHTML = `
`; body.appendChild(typingIndicator); body.scrollTop = body.scrollHeight; // Response Delay setTimeout(() => { if (body.contains(typingIndicator)) { body.removeChild(typingIndicator); } const responseText = matchResponse(query); const guruMsg = document.createElement('div'); guruMsg.className = 'chat-msg guru'; voiceCounter++; const btnId = `global-guru-speech-${voiceCounter}`; guruMsg.innerHTML = `
${responseText}
`; body.appendChild(guruMsg); body.scrollTop = body.scrollHeight; }, 1200); } } if (document.readyState === 'loading') { document.addEventListener('DOMContentLoaded', initChatbot); } else { initChatbot(); } })(); �थ": "केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के पवित्र हिमालय क्षेत्र में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह शिव जी के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसकी स्थापना पांडवों द्वारा की गई मानी जाती है और आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार किया था।" }; function matchResponse(query) { query = query.toLowerCase(); if (query.includes("ध्यान") || query.includes("meditation") || query.includes("sadhana")) { return answers["ध्यान"]; } else if (query.includes("पंचांग") || query.includes("panchang")) { return answers["पंचांग"]; } else if (query.includes("धाम") || query.includes("dham")) { return answers["चार धाम"]; } else if (query.includes("गायत्री") || query.includes("gayatri")) { return answers["गायत्री"]; } else if (query.includes("केदारनाथ") || query.includes("kedarnath")) { return answers["केदारनाथ"]; } else { return "वत्स! आपका प्रश्न अत्यंत कल्याणकारी है। सनातन मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग है। मन को शांत कर सत्यपथ पर चलें। क्या आप किसी विशिष्ट तीर्थ यात्रा अथवा दैनिक साधना के बारे में जानना चाहते हैं?"; } } let voiceCounter = 0; window.readGuruVoice = function(text, btnId) { window.speechSynthesis.cancel(); const utterance = new SpeechSynthesisUtterance(text); utterance.lang = 'hi-IN'; utterance.rate = 0.85; const btn = document.getElementById(btnId); btn.innerHTML = ' श्रवण जारी है...'; utterance.onend = () => { btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; utterance.onerror = () => { btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; window.speechSynthesis.speak(utterance); }; function submitGlobalMessage() { const query = input.value.trim(); if (query === "") return; // User Message bubble const userMsg = document.createElement('div'); userMsg.className = 'chat-msg user'; userMsg.textContent = query; body.appendChild(userMsg); input.value = ""; body.scrollTop = body.scrollHeight; // Typing Indicator const typingIndicator = document.createElement('div'); typingIndicator.className = 'chat-msg guru typing-indicator-container'; typingIndicator.innerHTML = `
`; body.appendChild(typingIndicator); body.scrollTop = body.scrollHeight; // Response Delay setTimeout(() => { body.removeChild(typingIndicator); const responseText = matchResponse(query); const guruMsg = document.createElement('div'); guruMsg.className = 'chat-msg guru'; voiceCounter++; const btnId = `global-guru-speech-${voiceCounter}`; guruMsg.innerHTML = `
${responseText}
`; body.appendChild(guruMsg); body.scrollTop = body.scrollHeight; }, 1200); } });