मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पददंष्ट्राकरालानि
दाढ़ों से विकराल
च
और
ते
आपके
मुखानि
मुखों को
दृष्ट्वा
देखकर
एव
ही
कालानलसन्निभानि
प्रलयकाल की अग्नि के समान
दिशः
दिशाएँ
न
नहीं
जाने
जानता
न
नहीं
लभे
पाता
च
और
शर्म
शांति
प्रसीद
प्रसन्न हों
देवेश
हे देवेश
जगन्निवास
हे जगन्निवास।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
आपके उन मुखों को, जो दाढ़ों से विकराल हैं और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रतीत होते हैं, देखकर मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा और मुझे शांति नहीं मिलती। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन भगवान् से शांति की याचना करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आपके उन मुखों को, जो दाढ़ों से विकराल हैं और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रतीत होते हैं, देखकर मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा और मुझे शांति नहीं मिलती। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के रौद्र रूप से मुक्ति का एकमात्र उपाय उनकी कृपा है।