मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदनभःस्पृशम्
आकाश को स्पर्श करने वाला
दीप्तम्
दीप्त
अनेकवर्णम्
अनेक रंगों वाला
व्यात्ताननम्
फैले हुए मुख वाला
दीप्तविशालनेत्रम्
दीप्त और विशाल नेत्रों वाला
दृष्ट्वा
देखकर
हि
ही
त्वाम्
आपको
प्रव्यथितान्तरात्मा
व्याकुल अंतरात्मा वाला
धृतिम्
धैर्य
न
नहीं
विन्दामि
पाता हूँ
शमम्
शांति
च
और
विष्णो
हे विष्णो।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे विष्णो, आपको आकाश को स्पर्श करते हुए, दीप्त, अनेक रंगों वाले, फैले हुए मुख वाले तथा दीप्त और विशाल नेत्रों वाले देखकर मेरी अंतरात्मा व्याकुल हो रही है और मुझे न धैर्य मिलता है, न शांति।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन का भय और बढ़ जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे विष्णो, आपको आकाश को स्पर्श करते हुए, दीप्त, अनेक रंगों वाले, फैले हुए मुख वाले तथा दीप्त और विशाल नेत्रों वाले देखकर मेरी अंतरात्मा व्याकुल हो रही है और मुझे न धैर्य मिलता है, न शांति।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् का विकराल रूप मनुष्य के सामान्य धैर्य को भी हिला सकता है।