श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 26

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 115 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
अमी
ये
च
और
त्वाम्
आपमें
धृतराष्ट्रस्य
धृतराष्ट्र के
पुत्राः
पुत्र
सर्वे
सभी
सह
सहित
एव
ही
अवनिपालसङ्घैः
राजाओं के समूहों के साथ
भीष्मः
भीष्म
द्रोणः
द्रोण
सूतपुत्रः
कर्ण
तथा
इसी प्रकार
असौ
वह
सह
सहित
अस्मदीयैः
हमारे
अपि
भी
योधमुख्यैः
प्रमुख योद्धाओं के साथ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

धृतराष्ट्र के ये सभी पुत्र तथा राजाओं के समूह, भीष्म, द्रोण, कर्ण और हमारे प्रमुख योद्धा भी आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन देखते हैं कि युद्ध के सभी योद्धा भगवान् के मुख में समा रहे हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

धृतराष्ट्र के ये सभी पुत्र तथा राजाओं के समूह, भीष्म, द्रोण, कर्ण और हमारे प्रमुख योद्धा भी आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् ही सबका संहार करते हैं, मनुष्य तो निमित्त मात्र हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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श्लोक 26/55 47% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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