श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 27

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
वक्त्राणि
मुखों में
ते
आपके
त्वरमाणाः
शीघ्रता से
विशन्ति
प्रवेश कर रहे हैं
दंष्ट्राकरालानि
दाढ़ों से विकराल
भयानकानि
भयानक
केचित्
कुछ
विलग्नाः
चिपके हुए
दशनान्तरेषु
दाँतों के बीच
सन्दृश्यन्ते
दिख रहे हैं
चूर्णितैः
चूर्ण हुए
उत्तमाङ्गैः
सिरों से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वे सब आपके उन भयानक दाढ़ों वाले मुखों में शीघ्रता से प्रवेश कर रहे हैं। कुछ तो दाँतों के बीच चिपके हुए दिख रहे हैं और उनके सिर चूर्ण हो गए हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् के मुख में योद्धाओं के विनाश का भयानक दृश्य।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वे सब आपके उन भयानक दाढ़ों वाले मुखों में शीघ्रता से प्रवेश कर रहे हैं। कुछ तो दाँतों के बीच चिपके हुए दिख रहे हैं और उनके सिर चूर्ण हो गए हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के संहारक रूप का यह दृश्य अर्जुन को युद्ध की अनिवार्यता का बोध कराता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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श्लोक 27/55 49% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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