श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 28

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 116 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
यथा
जैसे
नदीनाम्
नदियों के
बहवः
अनेक
अम्बुवेगाः
जल के वेग
समुद्रम्
समुद्र
एव
ही
अभिमुखाः
सम्मुख
द्रवन्ति
दौड़ते हैं
तथा
वैसे ही
तव
आपके
अमी
ये
नरलोकवीराः
मनुष्य लोक के वीर
विशन्ति
प्रवेश कर रहे हैं
वक्त्राणि
मुखों में
अभिविज्वलन्ति
प्रज्वलित हो रहे हैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे नदियों के अनेक जल के वेग समुद्र की ओर दौड़ते हैं, वैसे ही ये मनुष्य लोक के वीर आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

नदियों के समुद्र में मिलने के उदाहरण से विनाश की अनिवार्यता।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे नदियों के अनेक जल के वेग समुद्र की ओर दौड़ते हैं, वैसे ही ये मनुष्य लोक के वीर आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सबका अंत भगवान् में ही होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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