मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदयथा
जैसे
प्रदीप्तम्
प्रज्वलित
ज्वलनम्
अग्नि में
पतङ्गा
पतंगे
विशन्ति
प्रवेश करते हैं
नाशाय
नाश के लिए
समृद्धवेगाः
तीव्र वेग से
तथा
वैसे ही
एव
ही
नाशाय
नाश के लिए
विशन्ति
प्रवेश करते हैं
लोकाः
लोक
तव
आपके
अपि
भी
वक्त्राणि
मुखों में
समृद्धवेगाः
तीव्र वेग से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जैसे प्रज्वलित अग्नि में पतंगे तीव्र वेग से नाश के लिए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी तीव्र वेग से आपके मुखों में नाश के लिए प्रवेश कर रहे हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
पतंगों के अग्नि में गिरने का उदाहरण।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जैसे प्रज्वलित अग्नि में पतंगे तीव्र वेग से नाश के लिए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी तीव्र वेग से आपके मुखों में नाश के लिए प्रवेश कर रहे हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् की संहारक शक्ति के आगे कोई नहीं ठहर सकता।