मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदलेलिह्यसे
चाट रहे हो
ग्रसमानः
निगलते हुए
समन्तात्
चारों ओर से
लोकान्
लोकों को
समग्रान्
सम्पूर्ण
वदनैः
मुखों से
ज्वलद्भिः
प्रज्वलित
तेजोभिः
तेज से
आपूर्य
भरकर
जगत्
जगत्
समग्रम्
सम्पूर्ण
भासः
किरणें
तव
आपकी
उग्राः
उग्र
प्रतपन्ति
तपा रही हैं
विष्णो
हे विष्णो।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
आप अपने प्रज्वलित मुखों से चारों ओर के समस्त लोकों को चाटते हुए निगल रहे हैं। हे विष्णो, आपकी उग्र किरणें सम्पूर्ण जगत् को तेज से भरकर तपा रही हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् के संहारक रूप का भयानक वर्णन।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आप अपने प्रज्वलित मुखों से चारों ओर के समस्त लोकों को चाटते हुए निगल रहे हैं। हे विष्णो, आपकी उग्र किरणें सम्पूर्ण जगत् को तेज से भरकर तपा रही हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
प्रलयकाल में भगवान् ही सबका संहार करते हैं।