मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदत्वम्
आप
अक्षरम्
अक्षर (अविनाशी)
परमम्
परम
वेदितव्यम्
जानने योग्य
त्वम्
आप
अस्य
इस
विश्वस्य
विश्व के
परम्
परम
निधानम्
आधार
त्वम्
आप
अव्ययः
अविनाशी
शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातन धर्म के रक्षक
सनातनः
सनातन
त्वम्
आप
पुरुषः
पुरुष
मतः
माने जाते हैं
मे
मेरे द्वारा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
आप परम अक्षर (अविनाशी) हैं और जानने योग्य हैं; आप इस विश्व के परम आधार हैं; आप अविनाशी तथा सनातन धर्म के रक्षक हैं; आप सनातन पुरुष हैं – ऐसा मैं मानता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन भगवान् की स्तुति करते हुए उनके गुणों का वर्णन करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आप परम अक्षर (अविनाशी) हैं और जानने योग्य हैं; आप इस विश्व के परम आधार हैं; आप अविनाशी तथा सनातन धर्म के रक्षक हैं; आप सनातन पुरुष हैं – ऐसा मैं मानता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् सभी गुणों के आधार और सृष्टि के मूल हैं।