मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदअनादिमध्यान्तम्
जिसका न आदि, न मध्य, न अंत है
अनन्तवीर्यम्
अनंत पराक्रम वाले
अनन्तबाहुम्
अनंत भुजाओं वाले
शशिसूर्यनेत्रम्
चंद्र और सूर्य रूपी नेत्रों वाले
पश्यामि
देखता हूँ
त्वाम्
आपको
दीप्तहुताशवक्त्रम्
प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले
स्वतेजसा
अपने तेज से
विश्वम्
जगत्
इदम्
इस
तपन्तम्
तपाते हुए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत पराक्रम वाले, अनंत भुजाओं वाले, चंद्र और सूर्य रूपी नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले तथा अपने तेज से इस सम्पूर्ण जगत् को तपाते हुए देखता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
विराट रूप के और भी विशाल गुणों का वर्णन।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत पराक्रम वाले, अनंत भुजाओं वाले, चंद्र और सूर्य रूपी नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले तथा अपने तेज से इस सम्पूर्ण जगत् को तपाते हुए देखता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् की शक्ति असीम है, वे समस्त ब्रह्मांड को धारण करते हैं।