मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
19 पदद्यावापृथिव्योः
स्वर्ग और पृथ्वी के
इदम्
यह
अन्तरम्
अंतरिक्ष
हि
ही
व्याप्तम्
व्याप्त
त्वया
आपके द्वारा
एकेन
अकेले
दिशः
दिशाएँ
च
और
सर्वाः
सभी
दृष्ट्वा
देखकर
अद्भुतम्
अद्भुत
रूपम्
रूप
उग्रम्
उग्र
तव
आपका
इदम्
यह
लोकत्रयम्
तीनों लोक
प्रव्यथितम्
व्याकुल हो गए
महात्मन्
हे महात्मन्।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे महात्मन्, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह सम्पूर्ण अंतरिक्ष तथा सभी दिशाएँ आपके द्वारा ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत एवं उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
विराट रूप के प्रभाव से तीनों लोक कांप रहे हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे महात्मन्, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह सम्पूर्ण अंतरिक्ष तथा सभी दिशाएँ आपके द्वारा ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत एवं उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् का विराट रूप समस्त सृष्टि में व्याप्त है और उसकी महिमा अपार है।