मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदअमी
ये
हि
ही
त्वाम्
आपमें
सुरसङ्घाः
देवताओं के समूह
विशन्ति
प्रवेश कर रहे हैं
केचित्
कुछ
भीताः
भयभीत
प्राञ्जलयः
हाथ जोड़े हुए
गृणन्ति
स्तुति कर रहे हैं
स्वस्ति
कल्याण हो
इति
इस प्रकार
उक्त्वा
कहकर
महर्षिसिद्धसङ्घाः
महर्षियों और सिद्धों के समूह
स्तुवन्ति
स्तुति करते हैं
त्वाम्
आपकी
स्तुतिभिः
स्तुतियों से
पुष्कलाभिः
अनेक प्रकार की।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
ये देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं; कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं; तथा महर्षियों और सिद्धों के समूह "कल्याण हो" कहकर अनेक प्रकार की स्तुतियों से आपकी स्तुति करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
देवता और ऋषि भी विराट रूप से प्रभावित होकर उसकी स्तुति कर रहे हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
ये देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं; कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं; तथा महर्षियों और सिद्धों के समूह "कल्याण हो" कहकर अनेक प्रकार की स्तुतियों से आपकी स्तुति करते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् की महिमा से देवता भी विस्मित हैं।