श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 17

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
किरीटिनम्
मुकुट धारण किए हुए
गदिनम्
गदा धारण किए हुए
चक्रिणम्
चक्र धारण किए हुए
च
और
तेजोराशिम्
तेज के ढेर
सर्वतः
सब ओर
दीप्तिमन्तम्
दीप्तिमान
पश्यामि
देखता हूँ
त्वाम्
आपको
दुर्निरीक्ष्यम्
दुर्निरीक्ष्य (कठिनता से देखे जाने योग्य)
समन्तात्
चारों ओर
दीप्त
प्रज्वलित
अनल
अग्नि
अर्क
सूर्य
द्युतिम्
कांति वाला
अप्रमेयम्
अप्रमेय (जिसका माप न हो)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं आपको मुकुट धारण किए, गदा और चक्र धारण किए, तेज के ढेर के रूप में सब ओर दीप्तिमान देखता हूँ। आप चारों ओर से दुर्निरीक्ष्य हैं, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कांति वाले और अप्रमेय हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन भगवान् के आयुधों और तेज का वर्णन करते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं आपको मुकुट धारण किए, गदा और चक्र धारण किए, तेज के ढेर के रूप में सब ओर दीप्तिमान देखता हूँ। आप चारों ओर से दुर्निरीक्ष्य हैं, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कांति वाले और अप्रमेय हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् का स्वरूप अद्भुत और अगम्य है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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श्लोक 17/55 31% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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