मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदअनेक
अनेक
बाहु
भुजाएँ
उदर
उदर
वक्त्र
मुख
नेत्रम्
नेत्र
पश्यामि
देखता हूँ
त्वाम्
आपको
सर्वतः
सब ओर
अनन्तरूपम्
अनंत रूपों वाला
न
नहीं
अन्तम्
अंत
न
नहीं
मध्यम्
मध्य
न
नहीं
पुनः
फिर
तव
आपका
आदिम्
आदि
पश्यामि
देखता हूँ
विश्वेश्वर
हे विश्वेश्वर
विश्वरूप
हे विश्वरूप।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपको अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों से युक्त, सब ओर अनंत रूप धारण किए हुए देखता हूँ। मैं आपका न अंत देखता हूँ, न मध्य और न ही आदि।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन भगवान् के विराट रूप की अनंतता का वर्णन करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपको अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों से युक्त, सब ओर अनंत रूप धारण किए हुए देखता हूँ। मैं आपका न अंत देखता हूँ, न मध्य और न ही आदि।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् अनंत हैं, उनका न आदि है, न अंत।