मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदततः
तब
स
वह
विस्मयाविष्ट
आश्चर्य से युक्त
हृष्टरोमा
रोमांचित
धनञ्जय
धनंजय (अर्जुन)
प्रणम्य
प्रणाम करके
शिरसा
सिर से
देवम्
देव को
कृताञ्जलि
हाथ जोड़े हुए
अभाषत
बोले।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
तब आश्चर्यचकित और रोमांचित होकर धनंजय अर्जुन ने भगवान् को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन की प्रतिक्रिया: आश्चर्य, रोमांच, और फिर स्तुति।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
तब आश्चर्यचकित और रोमांचित होकर धनंजय अर्जुन ने भगवान् को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के दर्शन से भक्त का हृदय भावविभोर हो जाता है।