मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदतत्र
वहाँ
एकस्थम्
एक स्थान पर स्थित
जगत्
जगत्
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
प्रविभक्तम्
विभक्त
अनेकधा
अनेक प्रकार से
अपश्यत्
देखा
देवदेवस्य
देवों के देव (कृष्ण) के
शरीरे
शरीर में
पाण्डव
पाण्डुपुत्र (अर्जुन)
तदा
तब।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस देवों के देव (कृष्ण) के शरीर में सम्पूर्ण जगत् को अनेक प्रकार से विभक्त होकर एक स्थान पर स्थित देखा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन ने विराट रूप में सम्पूर्ण ब्रह्मांड को एक साथ देखा।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस देवों के देव (कृष्ण) के शरीर में सम्पूर्ण जगत् को अनेक प्रकार से विभक्त होकर एक स्थान पर स्थित देखा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् में समस्त सृष्टि का समावेश है।