श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 2

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 136 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
भव
उत्पत्ति
अप्ययौ
प्रलय
हि
निश्चय ही
भूतानाम्
प्राणियों की
श्रुतौ
सुने गए
विस्तरशः
विस्तार से
मया
मेरे द्वारा
त्वत्तः
आपसे
कमलपत्राक्ष
कमल-नेत्र
माहात्म्यम्
महिमा
अपि
भी
च
और
अव्ययम्
अविनाशी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कमलनेत्र! मैंने आपसे सब प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय तथा आपकी अविनाशी महिमा का विस्तारपूर्वक श्रवण किया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन अब विराट रूप देखने की इच्छा प्रकट करने से पूर्व, कृष्ण के पिछले उपदेशों का सारांश देते हैं और उनकी महिमा स्वीकार करते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन कहते हैं कि हे कमलनेत्र, मैंने आपसे सभी प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय तथा आपकी अविनाशी महिमा का विस्तार से श्रवण किया है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् की लीलाओं और महिमा को सुनना ही भक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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श्लोक 2/55 4% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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