श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 11

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 144 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
दिव्य
दिव्य
माल्य
मालाएँ
अम्बर
वस्त्र
धरम्
धारण किए हुए
दिव्य
दिव्य
गन्ध
गंध
अनुलेपनम्
अनुलेपन (चंदन आदि) वाला
सर्व
सब
आश्चर्यमयम्
आश्चर्यमय
देवम्
देव
अनन्तम्
अनंत
विश्वतोमुखम्
सब ओर मुख वाला।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह दिव्य मालाओं और वस्त्रों से युक्त, दिव्य गंध और चंदन से विभूषित, सब प्रकार से आश्चर्यमय, अनंत और सब ओर मुख वाला देव था।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

विराट रूप के और अधिक गुणों का वर्णन।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वह दिव्य मालाओं और वस्त्रों से युक्त, दिव्य गंध और चंदन से विभूषित, सब प्रकार से आश्चर्यमय, अनंत और सब ओर मुख वाला देव था।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् का रूप नित्य, दिव्य और सर्वव्यापी है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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