श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 4

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
मन्यसे
आप मानते हैं
यदि
यदि
तत्
वह
शक्यम्
संभव
मया
मेरे द्वारा
द्रष्टुम्
देखना
इति
इस प्रकार
प्रभो
हे प्रभु
योगेश्वर
हे योगेश्वर
ततः
तो
मे
मुझे
त्वम्
आप
दर्शय
दिखाइए
आत्मानम्
अपने को
अव्ययम्
अविनाशी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे प्रभो! यदि आप यह मानते हैं कि मैं आपके इस रूप को देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, आप मुझे अपने उस अविनाशी स्वरूप का दर्शन कीजिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन विनम्रतापूर्वक भगवान् से विराट रूप दिखाने का अनुरोध करते हैं, यह स्वीकार करते हुए कि यह उनकी कृपा से ही संभव है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे प्रभो, यदि आप मानते हैं कि मैं उस रूप को देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, मुझे अपना अविनाशी स्वरूप दिखाइए।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के दर्शन उनकी कृपा से ही संभव हैं, हमारे प्रयासों से नहीं। अर्जुन की विनम्रता इसका उदाहरण है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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