मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्रीभगवान्
भगवान्
उवाच
बोले
पश्य
देख
मे
मेरे
पार्थ
हे पार्थ
रूपाणि
रूपों को
शतशः
सैकड़ों
अथ
और
सहस्रशः
हजारों
नानाविधानि
अनेक प्रकार के
दिव्यानि
दिव्य
नानावर्णाकृतीनि
अनेक रंगों और आकृतियों वाले
च
भी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अर्जुन की इच्छा पूरी करने के लिए अपने विराट रूप के दर्शन की तैयारी कराते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् की अनंतता और विभिन्नता को दर्शाता यह श्लोक हमें उनकी असीम शक्ति का बोध कराता है।