श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 5

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 141 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
श्रीभगवान्
भगवान्
उवाच
बोले
पश्य
देख
मे
मेरे
पार्थ
हे पार्थ
रूपाणि
रूपों को
शतशः
सैकड़ों
अथ
और
सहस्रशः
हजारों
नानाविधानि
अनेक प्रकार के
दिव्यानि
दिव्य
नानावर्णाकृतीनि
अनेक रंगों और आकृतियों वाले
च
भी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् अर्जुन की इच्छा पूरी करने के लिए अपने विराट रूप के दर्शन की तैयारी कराते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् की अनंतता और विभिन्नता को दर्शाता यह श्लोक हमें उनकी असीम शक्ति का बोध कराता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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