मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदन
नहीं
तु
परन्तु
माम्
मुझे
शक्यसे
तू समर्थ है
द्रष्टुम्
देखने में
अनेन
इस
एव
ही
स्वचक्षुषा
अपनी आँखों से
दिव्यम्
दिव्य
ददामि
देता हूँ
ते
तुझे
चक्षुः
नेत्र
पश्य
देख
मे
मेरा
योगम्
योग
ऐश्वरम्
ऐश्वर्यमय।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु तू अपनी इन आँखों से मुझे नहीं देख सकता; इसलिए मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ। तू मेरे ऐश्वर्यमय योग को देख।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं क्योंकि साधारण नेत्रों से विराट रूप के दर्शन संभव नहीं हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
परन्तु तू अपनी इन आँखों से मुझे नहीं देख सकता; इसलिए मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ। तू मेरे ऐश्वर्यमय योग को देख।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के दर्शन के लिए दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होती है, जो उनकी कृपा से ही प्राप्त होती है।