मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदकटु
bitter
अम्ल
sour
लवण
salty
अत्युष्ण
very hot
तीक्ष्ण
pungent
रूक्ष
dry
विदाहिनः
burning
आहाराः
foods
राजसस्य
of the rajasic
इष्टाः
dear
दुःख
pain
शोक
grief
आमय
disease
प्रदाः
causing.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्यधिक गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले आहार राजस पुरुषों को प्रिय होते हैं, जो दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करने वाले होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राजस आहार अत्यधिक तीव्र स्वाद वाला, उत्तेजक और असन्तुलित होता है। यह शरीर और मन में अशान्ति, रोग और दुःख उत्पन्न करता है। Rajasic food is excessively spicy, sour, salty, hot, and dry, leading to discomfort, grief, and disease. It agitates the mind and body.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
राजस आहार वे खाद्य पदार्थ हैं जो अत्यधिक कड़वे, खट्टे, नमकीन, गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले होते हैं। ये राजसी प्रकृति के लोगों को प्रिय होते हैं, किन्तु ये दुःख, शोक और रोगों को जन्म देते हैं। ऐसा आहार मन और शरीर में अशांति लाता है।
Rajasic foods are those that are excessively bitter, sour, salty, hot, pungent, dry, and cause burning sensations. They are liked by people of rajasic nature, but they produce pain, grief, and disease. Such foods disturb the equilibrium of mind and body.