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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 13

अध्याय 9 · श्लोक 13

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः | भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || १३||

mahātmānas tu māṃ pārtha daivīṃ prakṛtim āśritāḥ | bhajanty ananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam ||13||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

महात्मानः: महात्मा लोग; तु: तो; माम्: मुझे; पार्थ: हे पार्थ (अर्जुन); दैवीम्: दैवी; प्रकृतिम्: प्रकृति; आश्रिताः: आश्रित होकर; भजन्ति: भजते हैं; अनन्य-मनसः: अनन्य मन वाले; ज्ञात्वा: जानकर; भूत-आदिम्: भूतों का आदि कारण; अव्ययम्: अविनाशी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! परन्तु महात्मा लोग दैवी प्रकृति के आश्रित होकर, मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि-कारण और अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।

English Translation

But the great souls, O Partha, who are possessed of divine nature, worship Me with a single mind, knowing Me as the imperishable source of all beings.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इसके विपरीत, महात्मा लोग दैवी प्रकृति के होते हैं और भगवान को सबका मूल कारण जानकर अनन्य भाव से भजते हैं। यहाँ दैवी प्रकृति का अर्थ सात्त्विक गुणों की प्रधानता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।