मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः | भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || १३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदमहात्मानः
महात्मा लोग
तु
तो
माम्
मुझे
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
दैवीम्
दैवी
प्रकृतिम्
प्रकृति
आश्रिताः
आश्रित होकर
भजन्ति
भजते हैं
अनन्य-मनसः
अनन्य मन वाले
ज्ञात्वा
जानकर
भूत-आदिम्
भूतों का आदि कारण
अव्ययम्
अविनाशी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! परन्तु महात्मा लोग दैवी प्रकृति के आश्रित होकर, मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि-कारण और अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इसके विपरीत, महात्मा लोग दैवी प्रकृति के होते हैं और भगवान को सबका मूल कारण जानकर अनन्य भाव से भजते हैं। यहाँ दैवी प्रकृति का अर्थ सात्त्विक गुणों की प्रधानता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! किन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा लोग, मुझे सम्पूर्ण भूतों के आदि-कारण तथा अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान को जानने वाले महात्मा उनका अनन्य भाव से भजन करते हैं। उनके लिए भगवान ही सर्वस्व हैं। दैवी प्रकृति वाले व्यक्ति सात्त्विक होते हैं और भक्ति में रत रहते हैं।