श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 13

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः | भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || १३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
महात्मानः
महात्मा लोग
तु
तो
माम्
मुझे
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
दैवीम्
दैवी
प्रकृतिम्
प्रकृति
आश्रिताः
आश्रित होकर
भजन्ति
भजते हैं
अनन्य-मनसः
अनन्य मन वाले
ज्ञात्वा
जानकर
भूत-आदिम्
भूतों का आदि कारण
अव्ययम्
अविनाशी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पार्थ! परन्तु महात्मा लोग दैवी प्रकृति के आश्रित होकर, मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि-कारण और अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इसके विपरीत, महात्मा लोग दैवी प्रकृति के होते हैं और भगवान को सबका मूल कारण जानकर अनन्य भाव से भजते हैं। यहाँ दैवी प्रकृति का अर्थ सात्त्विक गुणों की प्रधानता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे पार्थ! किन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा लोग, मुझे सम्पूर्ण भूतों के आदि-कारण तथा अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान को जानने वाले महात्मा उनका अनन्य भाव से भजन करते हैं। उनके लिए भगवान ही सर्वस्व हैं। दैवी प्रकृति वाले व्यक्ति सात्त्विक होते हैं और भक्ति में रत रहते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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श्लोक 13/34 38% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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