श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 12

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः || १२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
मोघ-आशाः
व्यर्थ आशा वाले
मोघ-कर्माणः
व्यर्थ कर्म वाले
मोघ-ज्ञानाः
व्यर्थ ज्ञान वाले
विचेतसः
विवेकहीन
राक्षसीम्
राक्षसी
आसुरीम्
आसुरी
च
और
एव
ही
प्रकृतिम्
प्रकृति
मोहिनीम्
मोहिनी (मोहित करने वाली)
श्रिताः
आश्रित हुए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ ज्ञान वाले और विवेकहीन होते हैं, तथा राक्षसी और आसुरी मोहिनी प्रकृति को ही आश्रय किए रहते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

पिछले श्लोक में वर्णित मूढ़ों की विशेषता बताई गई है। उनकी सारी आशाएँ, कर्म और ज्ञान व्यर्थ होते हैं क्योंकि वे भगवान को नहीं पहचानते। वे आसुरी प्रवृत्ति के अधीन होते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

उनकी आशाएँ व्यर्थ होती हैं, उनके कर्म व्यर्थ होते हैं, उनका ज्ञान व्यर्थ होता है, और वे विवेकहीन होते हैं। वे राक्षसी एवं आसुरी मोहिनी प्रकृति के आश्रित होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

बिना ईश्वर-चेतना के सभी प्रयास अन्ततः व्यर्थ हैं। आसुरी प्रवृत्ति मोह पैदा करती है और विवेक को नष्ट करती है। सच्ची सफलता के लिए ईश्वर-भक्ति आवश्यक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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श्लोक 12/34 35% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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