मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः || १२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदमोघ-आशाः
व्यर्थ आशा वाले
मोघ-कर्माणः
व्यर्थ कर्म वाले
मोघ-ज्ञानाः
व्यर्थ ज्ञान वाले
विचेतसः
विवेकहीन
राक्षसीम्
राक्षसी
आसुरीम्
आसुरी
च
और
एव
ही
प्रकृतिम्
प्रकृति
मोहिनीम्
मोहिनी (मोहित करने वाली)
श्रिताः
आश्रित हुए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ ज्ञान वाले और विवेकहीन होते हैं, तथा राक्षसी और आसुरी मोहिनी प्रकृति को ही आश्रय किए रहते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
पिछले श्लोक में वर्णित मूढ़ों की विशेषता बताई गई है। उनकी सारी आशाएँ, कर्म और ज्ञान व्यर्थ होते हैं क्योंकि वे भगवान को नहीं पहचानते। वे आसुरी प्रवृत्ति के अधीन होते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
उनकी आशाएँ व्यर्थ होती हैं, उनके कर्म व्यर्थ होते हैं, उनका ज्ञान व्यर्थ होता है, और वे विवेकहीन होते हैं। वे राक्षसी एवं आसुरी मोहिनी प्रकृति के आश्रित होते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
बिना ईश्वर-चेतना के सभी प्रयास अन्ततः व्यर्थ हैं। आसुरी प्रवृत्ति मोह पैदा करती है और विवेक को नष्ट करती है। सच्ची सफलता के लिए ईश्वर-भक्ति आवश्यक है।