मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय | उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || ९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदन
नहीं
च
और
माम्
मुझे
तानि
वे
कर्माणि
कर्म
निबध्नन्ति
बाँधते हैं
धनञ्जय
हे धनञ्जय (अर्जुन)
उदासीन-वत्
उदासीन के समान
आसीनम्
स्थित
असक्तम्
आसक्ति रहित
तेषु
उनमें
कर्मसु
कर्मों में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे धनञ्जय! वे कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्ति रहित, उदासीन के समान स्थित हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान सृष्टि के कर्ता होते हुए भी उनसे अनासक्त रहते हैं। वे कर्मों के फल से प्रभावित नहीं होते। यही ईश्वर की निर्लिप्तता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! वे सब कर्म मुझे बाँधते नहीं, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्ति रहित, उदासीन की भाँति स्थित हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर कर्ता होते हुए भी अकर्ता है। वह कर्मों के फल से स्पर्शित नहीं होता। मनुष्य को भी अनासक्त भाव से कर्म करना चाहिए, जिससे वह बंधन में न आए।