श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 10

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् | हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || १०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
मया
मेरे द्वारा
अध्यक्षेण
अध्यक्ष रूप से
प्रकृतिः
प्रकृति
सूयते
उत्पन्न करती है
स-चर-अचरम्
चर और अचर सहित
हेतुना
कारण से
अनेन
इस
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
जगत्
जगत्
विपरिवर्तते
परिवर्तित होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! मेरे अध्यक्ष रहने से प्रकृति चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती है, और इसी कारण यह जगत् बार-बार परिवर्तित होता रहता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रकृति या माया ईश्वर के अधीन है। ईश्वर की देख-रेख में ही प्रकृति सृष्टि, स्थिति और प्रलय करती है। यह चक्र अनवरत चलता रहता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कुन्तीपुत्र! मेरे अध्यक्ष (नियन्ता) होने पर प्रकृति चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती है, और इसी कारण यह जगत् परिवर्तित होता रहता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

प्रकृति स्वतन्त्र नहीं है, वह ईश्वर के नियन्त्रण में कार्य करती है। इसलिए जगत् के परिवर्तनों में मोहित न होकर, ईश्वर की सत्ता को पहचानना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/34 29% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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